करण कारक (तृतीया विभक्ति) – Karan Karak in Sanskrit

Karan Karak in Sanskrit

करण कारक (तृतीया विभक्ति) क्या है? इसकी परिभाषा, पहचान, विभक्ति, संस्कृत एवं हिंदी उदाहरण, नियम, प्रयोग और अभ्यास प्रश्न सरल भाषा में पढ़ें।

१. सूत्र- “साधकतमं करणम् कर्तृकरणयोस्तृतीया ।”

नियम- जिसकी सहायता से कर्त्ता अपना कार्य पूर्ण करता है, उसमें करण कारक होता है और करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है। इसका चिन्ह ‘से’ (with) तथा द्वारा है।

जैसे- ‘सः नेत्राभ्यां पश्यति’ (वह दो नेत्रों से देखता है ।) यहाँ देखने का कार्य नेत्रों से होता है, अतः नेत्राभ्याम् में तृतीया है।

२. सूत्र- “स्वतन्त्रः कर्त्ता, कर्तृकरणयोस्तृतीया ।”

नियम- कर्म वाच्य तथा भाव वाच्य के कर्त्ता में तृतीया होती है।

जैसे- रामेण गम्यते ।. (राम के द्वारा जाया जाता है ।)

३. सूत्र- “सहयुक्तेऽप्रधाने।”

नियम- ‘ साथ’ अर्थ रखने वाले सह, साकम्, समम् और सार्धम् शब्दों के योग में तृतीया होती है।

जैसे- रामः कृष्णेन सह गच्छति । (राम कृष्ण के साथ जाता है ।) इस वाक्य में ‘कृष्ण’ तथा ‘सह’ का योग है, क्योंकि कृष्ण के साथ जाता है। अतः कृष्णेन् में तृतीया है।

इसी प्रकार छात्रः गुरुणा साकम् या समम् आगच्छति । मनोहरः श्यामेन साकं क्रीडति । अहं जनकेन सार्धम् गच्छामि में गुरुणा, श्यामेन, जनकेन में तृतीया है।

४. सूत्र- “हेतौ।”

नियम- ‘हेतु’ अर्थ में तृतीया होती है।

जैसे – धनेन सम्मानः भवति । (धन से सम्मान होता है ।) सम्मान होने का हेतु ‘धन’ है। अतः ‘धनेन’ में तृतीया है।

५. सूत्र- “येनाङ्गविकारः।”

नियम- जिस अंग के द्वारा शरीर में कोई विकार उत्पन्न होता है, उसमें तृतीया होती है।

जैसे- सः नेत्रेण काणः अस्ति । (वह आँख से काना है।) इसमें आँख के द्वारा शरीर में कानेपन का विकार उत्पन्न हो गया है, अतः नेत्रेण में तृतीया है।

६. सूत्र- “तुल्यार्थेरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्।”

नियम- तुल्य, सदृश आदि समानार्थक शब्दों के योग में जिससे तुलना की जाती है उसमें तृतीया या षष्ठी विभक्ति होती है ।

जैसे- सः रामेण तुल्यः अस्ति । (वह राम के समान है।) अथवा सः रामस्य तुल्यः अस्ति ।

कालिदासेन सदृशः कोऽपि कविः नास्ति । (कालिदास के समान कोई कवि नहीं है।)

बिना के योग में तृतीया भी होती है जैसे- सः धनेन बिना कथं पठिष्यति = वह धन के बिना कैसे पढ़ेगा ?

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