सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति): परिभाषा, उदाहरण एवं नियम

सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति) – परिभाषा, नियम और उदाहरण

सम्प्रदान कारक क्या है? चतुर्थी विभक्ति के नियम व उदाहरण

सम्प्रदान कारक वह कारक है जिससे किसी कार्य के लिए जिस व्यक्ति या वस्तु को कुछ दिया जाए, जिसके लिए कार्य किया जाए, या जिसे लाभ/उद्देश्य प्राप्त हो, उसका बोध होता है। संस्कृत में इसके लिए चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

१. सूत्र- “कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्।” (चतुर्थी सम्प्रदाने)

नियम- जिसको कोई वस्तु दी जाती है या जिसके लिए कोई कार्य किया जाता है, उसमें सम्प्रदान कारक होता है और सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है। इसका चिन्ह ‘के लिए’ अथवा ‘को’ है।

जैसे – राजा विप्राय धेनुं ददाति (राजा ब्राह्मण को गाय देता है।) इस वाक्य में विप्र को धेनु दिये जाने का वर्णन है अतः विप्राय’ में चतुर्थी हुई।

अहं छात्राय पुस्तकम् आनयामि (मैं विद्यार्थी के लिए पुस्तक लाता हूँ।) इस वाक्य में छात्र के लिए पुस्तक को लाने का कार्य किया जा रहा है, अतः ‘छात्राय’ में चतुर्थी है।

विशेष– जिसे कोई वस्तु सदा के लिए दी जाती है और देने वाले का अधिकार उस पर समाप्त हो जाता है, तभी उक्त नियम के अनुसार चतुर्थी होती है। जैसे-उक्त ‘राजा विप्राय धेनुं ददाति’ वाक्य में ब्राह्मण को गाय सदा के लिए दे दी गयी है और राजा का उस गाय पर कोई अधिकार नहीं रह गया है। अतः विप्राय’ में चतुर्थी हुई ।

किन्तु जहाँ कोई वस्तु किसी भी प्रयोजन से थोड़े समय के लिए किसी दूसरे को दी जाती है और दाता का उस वस्तु पर से अधिकार समाप्त नहीं होता है, वहाँ चतुर्थी नहीं होती है बल्कि ‘षष्ठी’ होती है।

जैसे- मैं धोबी को कपड़े देता हूँ। धोबी को कपड़े सदा के लिए नहीं दिये गये हैं अतः ‘षष्ठी’ होगी और वाक्य की संस्कृत ‘अहं रजकस्य वस्त्रं ददामि’ होगी तथा वह दर्जी को वस्त्र देता है, की संस्कृत-‘सः शौचिकस्य वस्त्रं ददाति’ होगी ।

२. सूत्र- “रुच्यर्थानां प्रीयमाणः।”

नियम-‘रुचि’ अर्थ रखने वाली धातुओं के योग में जिसे कोई वस्तु अच्छी लगती है ‘उसमें चतुर्थी होती है।

जैसे- रामाय पठनं रोचते । (राम को पढ़ना अच्छा लगता है।) इस वाक्य में राम को पढ़ना अच्छा लगता है तथा रुचि अर्थ वाली धातु में रुचि का योग भी है। अतः ‘रामाय’ में चतुर्थी हुई।

३. सूत्र- “क्रुधदुहेर्व्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः।”

विशेष- क्रुधू (गुस्सा होना), दुह (द्रोह करना, शत्रुता करना), ईष्य् (ईष्या या डाह करना), असूयू (गुणों में दोष निकालना या जलन करना) धातुओं तथा इनकी समानार्थक धातुओं के योग में जिस पर क्रोध किया जाता है, द्रोह किया जाता है, ईर्ष्या की जाती है या असूया की जाती है, उसमें चतुर्थी होती है।

जैसे- सः हरये क्रुध्यति, दुह्यति, ईर्ष्याति, असूयति वा । (वह हरि से क्रुद्ध होता है, द्रोह करता है, ईर्ष्या करता है अथवा असूया करता है।)

विशेष- किन्तु जब ‘क्रुध्’ तथा ‘द्रुह्’ धातुओं से पहले कोई उपसर्ग आता है तो उनके योग में चतुर्थी के स्थान पर द्वितीया होती है।

जैसे- सः रामम्, अभिक्रुध्यति । (वह राम से गुस्सा होता है।)

४. सूत्र- “नमः स्वस्ति स्वाहा स्वधाऽलं वषद् योगाच्च ।”

नियम- नमः, स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा, अलम् (समर्थ, पर्याप्त, बराबर के जोड़ का हो) तथा वषट् के योग में चतुर्थी होती है जैसे-

नमः – श्री गणेशाय नमः । (श्री गणेशजी को नमस्कार है ।)

स्वस्ति- प्रजाभ्यः स्वस्ति । (प्रजा का कल्याण हो ।)

स्वाहा- अग्नये स्वाहा । (अग्नि के लिए बलि है।)

स्वधा- पितृभ्यः स्वधा । (पितृ गणों के लिए बलि है।)

अलम्- रामः रावणाय अलम् । (राम रावण के लिए पर्याप्त है अर्थात् बराबर के जोड़ के हैं।)

५. सूत्र- (वार्तिक) “तादयॆ चतुर्थी वाच्या।”

नियम- जिस प्रयोजन के लिए कोई कार्य किया जाता है अथवा जिस वस्तु के निर्माण के लिए कोई वस्तु प्रयुक्त होती है, उसमें चतुर्थी होती है। जैसे-

प्रयोजन- भक्तः मुक्तये हरि भजति । (भक्त मुक्ति के लिए भगवान् का भजन करता है ।)

निर्माण- यूपाय दारुः अस्ति । (यज्ञ स्तम्भ बनाने के लिए लकड़ी है।)

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