अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति): परिभाषा, उदाहरण, सूत्र एवं नियम

अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति) की परिभाषा, सूत्र और उदाहरण

अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति) संस्कृत व्याकरण का महत्वपूर्ण कारक है। इसमें जिस स्थान या आधार में कोई कार्य होता है, उसे अधिकरण कहते हैं। इसका प्रयोग मुख्यतः ‘में’ और ‘पर’ के अर्थ में होता है।

१. सूत्र— “आधारोऽधिकरणम्, सप्तम्यधिकरणे च।”

नियम— जिस स्थान या वस्तु में कोई कार्य होता है, उसे अधिकरण कहते हैं और अधिकरण में कोई कार्य होता है जिसका चिह्न ‘में’ या ‘पर’ है।

बालक विद्यालये पठति। (बालक विद्यालय में पढ़ता है।) यहाँ बालक का कार्य विद्यालय में हो रहा है।

स्थाल्यां तण्डुलान् पचति। (बटलोई में चावल पकाता है।) यहाँ पकाने का कार्य थाली में हो रहा है। ‘स्थाल्याम्’ में सप्तमी है।


२. सूत्र— “यतश्च निर्धारणम् ।”

नियम— जब किसी समुदाय या व्यक्ति की किसी विशेषण के द्वारा कोई विशेषता बतलाई जाती है, तब समुदाय वाचक शब्दों में षष्ठी या सप्तमी होती है।

जैसे— धेनूनां धेनुषु कृष्णा बहुक्षीरा।(गायों में काली गाय अधिक दूध देती है।) यहाँ गायों के समुदाय में ‘बहुक्षीरा’ विशेषण के द्वारा ‘काली गाय’ की विशेषता बतलाई गई है। अतः ‘धेनूनाम्’ तथा ‘धेनुषु’ में षष्ठी और सप्तमी हुई है।

पाण्डवानां पाण्डवेषु वा भीमः बलवत्तमः आसीत्।

(पाण्डवों में भीम सबसे बलवान था।)

यहाँ पाण्डवों में भीम की ‘बलवत्तमः’ विशेषण द्वारा विशेषता बतलाई गई है। अतः ‘पाण्डवानाम्’ तथा ‘पाण्डवेषु’ में क्रमशः षष्ठी और सप्तमी हुई है।

नियम— जिसके लिए स्नेह, आसक्ति अथवा सम्मान प्रदर्शित किया जाता है, उसमें सप्तमी होती है। जैसे—

स्नेह— दशरथ रामोऽस्निह्यत्।

(दशरथ राम से स्नेह करते थे।) यहाँ राम पर स्नेह दिखाया गया है। अतः राम में सप्तमी है।

आसक्ति— शकुन्तलायां दुष्यन्तस्य आसक्तिः आसीत्।
(दुष्यन्त की शकुन्तला पर आसक्ति थी।) यहाँ शकुन्तला पर दुष्यन्त की आसक्ति है। अतः ‘शकुन्तलायाम्’ में सप्तमी है।

सम्मान— गुरौ भक्तिः कर्तव्या।
(गुरुजी में भक्ति रखनी चाहिए।) यहाँ गुरुजी में सम्मान प्रकट किया है, अतः ‘गुरौ’ में सप्तमी है।

कार्तिक— ‘साध्वसाधु प्रयोगे च’ साधु और असाधु के योग में अधिकरण कारक का प्रयोग होता है जैसे—
त्वं सत्सुसाधु दृष्टेषु च असाधुः असि।

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