1. कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति)
कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति) की परिभाषा, पहचान, उदाहरण, नियम और संस्कृत में प्रयोग आसान भाषा में जानें। कर्ता कारक के एकवचन, द्विवचन और बहुवचन के उदाहरण सहित।
१. क्रिया करने वाले को कर्ता कहते हैं। हिन्दी में इसका चिन्ह ‘ने’ है, जैसे—राम ने पुस्तक पढ़ी। कभी-कभी यह (ने) छिप जाता है, जैसे—राम जाता है।
क्रिया के आगे कौन लगाने से जो उत्तर में आता है, वही कर्ता होता है, जैसे—राम जाता है। कौन जाता है? ‘राम’ अतः राम कर्ता है। कर्तृ वाच्य के कर्ता में ‘प्रथमा’ विभक्ति होती है। जैसे—रामः गच्छति। किन्तु भाव वाच्य तथा कर्म वाच्य के कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है। जैसे—रामेण गम्यते।
२. कर्म वाच्य के कर्म में ‘प्रथमा’ विभक्ति होती है। जैसे—मया ग्रन्थः पठ्यते। के ‘ग्रन्थ’ में प्रथमा है।
३. ‘सम्बोधन’ में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे—भो राम! इह आगच्छ। के ‘राम’ में सम्बोधन है।
अतः कर्ता कारक के अनुवाद करने के लिए निम्न बातों को जानना आवश्यक है—
१. संस्कृत में तीन वचन (एकवचन, द्विवचन और बहुवचन) तथा तीन पुरुष (प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष) होते हैं।
२. एक के लिए एकवचन, दो के लिए द्विवचन और दो से अधिक के लिए बहुवचन आते हैं।
३. जिसके बारे में बात कही जाय उसमें (सः = वह, तौ = वे दोनों, ते = वे सब, भवान् = आप, भवन्तौ = आप दोनों, भवन्तः = आप सब) अथवा किसी का नाम प्रथम पुरुष होता है।
४. जिससे बात कही जाये उसमें (त्वम् = तू, युवाम् = तुम दोनों, यूयम् = तुम सब) मध्यम पुरुष होता है।
५. जो बात कहे उसमें (अहम् = मैं, आवाम् = हम दोनों, वयम् = हम सब) उत्तम पुरुष होता है।
अतः नीचे दिये गये पुरुष चक्र को भली प्रकार याद कर लेना चाहिए।
(कर्ता) पुरुष चक्रम्
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पुल्लिंग: सः (वह), भवान् (आप), रामः (राम) | तौ (वह दोनों), भवन्तौ (आप दोनों), रामौ (दो राम), ते (वे दोनों), भवत्यौ (आप दोनों), रमे (दो रमाएँ) | ते (वे सब), भवन्तः (आप सब), रामाः (बहुत से राम), ताः (वे सब), भवत्यः (आप सब), रमाः (बहुत रमाएँ) |
| स्त्रीलिंग: सा (वह), भवती (आप), रमा (रमा) | |||
| नपुंसकलिंग: तत् (वह), मित्रम् (मित्र) | ते (वे दोनों), मित्रे (दो मित्र) | तानि (वे सब), मित्राणि (बहुत से मित्र) | |
| मध्यम पुरुष | त्वम् (तू) | युवाम् (तुम दोनों) | यूयम् (तुम सब) |
| उत्तम पुरुष | अहम् (मैं) | आवाम् (हम दोनों) | वयम् (हम सब) |
क्रियाओं में उपयुक्त वचन और पुरुष होते हैं। कर्तृवाच्य में क्रिया का वही वचन और पुरुष होता है जो उसके कर्ता का होता है।
अनुवाद करते समय इस बात का ध्यान रखना परम आवश्यक है। आगे लिखे चक्र में यह बात स्पष्ट हो जायेगी।
| पुरुष | लिंग | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|---|
| प्रथम पुरुष | पुल्लिंग | सः पठति।(वह पढ़ता है।) | तौ पठतः।(वे दोनों पढ़ते हैं।) | ते पठन्ति।(वे सब पढ़ते हैं।) |
| बालकः पठति।(बालक पढ़ता है।) | बालकौ पठतः।(दो बालक पढ़ते हैं।) | बालकाः पठन्ति।(बालक पढ़ते हैं।) | ||
| स्त्रीलिंग | सा पठति।(वह पढ़ती है।) | ते पठतः।(वे दोनों पढ़ती हैं।) | ताः पठन्ति।(वे सब पढ़ती हैं।) | |
| पुल्लिंग | भवान् पठति।(आप पढ़ते हैं।) | भवन्तौ पठतः।(आप दोनों पढ़ते हैं।) | भवन्तः पठन्ति।(आप सब पढ़ते हैं।) | |
| स्त्रीलिंग | भवती पठति।(आप पढ़ती हैं।) | भवत्यौ पठतः।(आप दोनों पढ़ती हैं।) | भवत्यः पठन्ति।(आप सब पढ़ती हैं।) | |
| मध्यम पुरुष | — | त्वं पठसि।(तू पढ़ता/पढ़ती है।) | युवां पठथः।(तुम दोनों पढ़ते/पढ़ती हो।) | यूयं पठथ।(तुम सब पढ़ते/पढ़ती हो।) |
| उत्तम पुरुष | — | अहं पठामि।(मैं पढ़ता/पढ़ती हूँ।) | आवां पठावः।(हम दोनों पढ़ते/पढ़ती हैं।) | वयं पठामः।(हम सब पढ़ते/पढ़ती हैं।) |
मध्यम पुरुष एवं उत्तम पुरुष के रूप में प्रयुक्त रूप पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग में यही रहते हैं।
संस्कृत में शब्दों के उलट-फेर करने से वाक्य के अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे—पिता पुत्रं ताडयति (पिता पुत्र को पीटता है) के शब्दों के क्रम में परिवर्तन करने से ‘पुत्रं ताडयति पिता’ अथवा ‘ताडयति पुत्रं पिता’ आदि हो सकते हैं, किन्तु इनका अर्थ वही रहता है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है।
अनुवाद करते समय सबसे पहले हमें वाक्य का कर्ता ढूँढ़ना चाहिए। क्रिया से पहले ‘कौन’ लगाने से उत्तर में आने वाला शब्द कर्ता होता है। अगर कर्ता एकवचन हो तो प्रथम पुरुष एकवचन का रूप, द्विवचन हो तो प्रथम का द्विवचन का रूप और बहुवचन हो तो बहुवचन का रूप लिख देना चाहिए। इसके बाद कर्ता के पुरुष पर ध्यान देना चाहिए। कर्ता के पुरुष और वचन जान लेने पर क्रिया के काल का निश्चय करना चाहिए। इसके बाद क्रिया उस काल के रूपों में से कर्ता के पुरुष और वचन वाला एक रूप छाँटकर लिख देना चाहिए, इसके बाद वाक्य के अन्य शब्दों के कारक तथा वचनों के अनुसार रूप भी यथास्थान लिख देना चाहिए। जैसे—‘हम दोनों गुरुजी से पुस्तक पढ़ते हैं’ वाक्य का संस्कृत में अनुवाद करना है।
क्रिया से पहले कौन! लगाने के उत्तर में ‘हम दोनों’ आता है, अतः हम दोनों कर्ता हैं। हमने इनकी संस्कृत ‘आवाम्’ लिख ली। कर्ता उत्तम-पुरुष द्विवचन का है और क्रिया वर्तमान काल में है अतः हमने पढ़ क्रिया का वर्तमान काल का उत्तम पुरुष द्विवचन का ‘पठावः’ लिख लिया। ‘गुरुजी से’ में अपादान कारक या पंचमी विभक्ति का ‘एकवचन’ है। अतः ‘गुरु’ शब्द का पंचमी एकवचन ‘गुरोः’ इसी प्रकार ‘पुस्तक को’ की संस्कृत कर्म कारक या द्वितीया विभक्ति का एकवचन का रूप ‘पुस्तकम्’ लिख लिया। इस प्रकार उक्त वाक्य की संस्कृत ‘आवां गुरोः पुस्तकं पठावः’ हुई।
