मंत्र जप के प्रकार:– १. वैखरी जप :- मौखिक जप को वैखरी कहा जाता है । इसमें मन्त्र का उच्चारण स्पष्ट रूप से किया जाता है। २. उपांशु जप :- फुसफुसाहट के साथ जप करने को उपांशु जप कहते हैं । ३. मानसिक जप :- मानसिक जप सबसे आधिक शक्तिशाली हैं । इस प्रकार के जप में जीभ और होंठ दोनों ही नहीं हिलते, बल्कि मन ही मन मन्त्र का जाप करते है। मंत्र जाप में भिन्नता की आवश्यकता मंत्र जाप करते समय कुछ देर तक उच्चारण करते हुए (वैखरी…
Read MoreCategory: साधना प्रकरण
ईश्वर को याद रखने के लिए माला की जरूरत
ईश्वर और उसकी सर्वव्यापी महिमा को याद रखने के लिए माला की जरूरत तुम्हें सदैव अपने गले में या जेब में माला रखनी चाहिए तथा रात को सिरहाने के नीचे उसको रख लेना चाहिए । जब तुम माया अथवा अविद्या के कारण ईश्वर का विस्मरण कर दोगे तो माला उसका तुम्हें पुन: स्मरण कराएगी । रात की जब तुम लघुशंका के लिए उठते हो, तव माला तुन्हें याद दिलगी कि तुम उसको एक दो बार फेर लो । मन कौ वश में करने के लिए माला एक उत्तम उपकरण है…
Read Moreमन्त्र जप के लिए तीन प्रकार की बैठकें
उषाकाल तथा गोधूलि की बेला में एक रहस्यमय आध्यात्मिक वातावरण कर्मशील रहता है ओर एक अदभुत आकर्षण होता है । अतः इन दोनों संधिकालों में मन सीघ्र ही पवित्रता को प्राप्त होने लग जायगा । और सत्व से परिपूरित हो जायगा । सूरज निकलने और डूबने के समय चित्त को एकाग्र करना बहुत ही सुगम होता है । अतः जप का अभ्यास संधिकाल में करना चाहिए । इस समय चित्त एकदम शान्त और तजा होता है । अत: ध्यान लगने में सरलता होती है ध्यान जीवन का अनिवार्य उत्तरदायित्व है…
Read Moreमंत्र का जप करते समय मन को एकाग्र कैसे करते है
तुम हृदय-कमल ( अनाहत चक्र ) पर अपने चित्त को स्थिर कर एकाग्र करो, या दोनो भ्रकुटीओ के मध्य का स्थान आज्ञा चक्र कहलाता है उस पर करो । हठयोंगियो के अनुसार आज्ञा चक्र मस्तिष्क का स्थान है । यदि कोई मनुष्य आज्ञा चक्र पर चित्त को लगा कर उसे एकाग्र कर लेता है तो उसका मस्तिष्क सुगमता से उसके वश में हो जाएगा । अपने स्थान पर बैठ जाओ । आँखे बन्द कर लो और जप तथा ध्यान करना आरम्भ कर दो । जब कोई दोनों भृकुटिओ के बीच…
Read Moreमंत्र जप के लिए आसन व दिशा की आवश्यकता
जप के लिए आसन:- मंत्र जप आधे घंटे से लेकर प्रारम्भ करना चाहिए पदम, सिद्ध सुखासन अथवा स्वस्तिक आसन पर बैठो । धीरे धीरे करके मंत्र जप का समय बढाते जाओ और तीन घंटे तक कर दो लगभग एक साल के अन्दर तुम को – आसन-सिद्धि प्राप्त हो जायेगी, अर्थात् तुम्हें उस विशेष श्रासन पर बैठने से कष्ट नहीं प्रतीत होगा । सुम स्वाभाविक रूप से ही उस आसन पर बैठ जाया करोगे । शरीर को किसी भी सरल तथा सुखपूर्वक अवस्था में स्थिर रखने को आसन कहते हैं-स्थिरम सुखमासनम्…
Read Moreआध्यात्मिक साधना के लिए ब्रह्म मुहूर्त तथा इष्ट देवता की आवश्यकता
आध्यात्मिक साधना के लिए ब्रह्म मुहूर्त की आवश्यकता:- ब्रह्ममुहूर्त में प्रातःकाल चार बजे उठो । ब्रह्ममुहूर्त का काल आध्यात्मिक साधना के लिए और जप करने के लिए सबसे अच्छा समय है । प्रातःकाल हमारा चित्त सर्वथा ताजा, पवित्र, स्वच्छ तथा बिलकुल शांत होता है । इस समय मष्तिष्क बिलकुल कोरे कागज की भांति होता है । और दिन की अपेक्षा सांसारिक कार्यों से अधिक स्वतन्त्र होता है । इस समय हम चित्त को किसी भी कार्य में सुगमतापूर्वक लगा सकते हैं । इस विशेष समय पर वातावरण में अधिक सत्व…
Read Moreईश्वर साधना के लिए ध्यान के कमरे की आवश्यकता
ध्यान करने का कमरा बिल्कुल अलग रहना चाहिए और उसमें ध्यान करने के समय के अतिरिक्त पूरे समय ताला पडा रहे । उस कमरे में कोई भी नहीं जाना चाहिए । प्रातःकाल और संध्या को उसमें धूप जला दो । उसमें श्री कृष्ण जी की एक मूर्ति या अपने देवता की तस्वीर रखो । तस्वीर के सामने आप आसन बिछा दो । जब तुम उस कमरें में बैठ कर मन्त्र का जप करोगे, तो जो शक्तिशाली स्पन्दन उससे उठेंगे, वे कमरे के वातावरण में ओतप्रोत हो जायेंगे । छ: महीने…
Read Moreआत्म-शुद्धि और ईश्वर के दर्शन के लिए गुरु की आवश्यकता
गुरु की आवश्यकता:- गुरु की आवश्यकता अकथनीय हैं । आध्यात्मिक मार्ग चारों ओर से कठिनाइयों से आकीर्ण है । गुरु साधक को उचित मार्ग का निदर्शन करा देगा और इससे सब कठिनाइया और विघ्न – वाधाए दूर हो जाएगी है । गुरूमुख से सुने गए शब्दों में पूर्ण श्रद्धा रखो:- गुरु, ईश्वर, ब्राह्मण , सत्य तथा ॐ एक ही है । गुरु की सेवा भक्तिसहित करो । उसको सब प्रकार से प्रसन्न रखो । अपने चित्त को पूर्णत: गुरु की सेवा में लगा दो । उनकी आज्ञा का पालन अटूट…
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